29/09/2024
भारतीय मुस्लिम और मुस्लिम धर्म स्थल पर हो रहें ज़ुल्म के खिलाफ सभी धर्म के लोगों को आवाज बुलंद करने की जरूरत है !
भारत में मुसलमानों के विरुद्ध हिंसाः ज़मीनी स्तर पर खोज. मौजूदा दौर में भारत में मुसलमान नफ़रत, हिंसा, उत्पीड़न और नर-पिशाचों के दानवी अत्याचार को झेल रहे हैं. भारतीय मुसलमानों के मौजूदा संघर्ष का अध्ययन करते समय, दो प्रकार के जाल में से किसी एक जाल में फँसने की प्रवृत्ति होती है: उत्पीड़न या रोमानीकरण. पहले जाल में फँसकर मुसलमान हर प्रकार की एजेंसी से अलग-थलग पड़ जाते हैं और दूसरे जाल में पड़कर उसका महिमामंडन तो होता है, लेकिन इस लड़ाई में उनके जीतने की कोई गुंजाइश नहीं रहती. कर्नाटक राज्य में आधिकारिक रूप में हिजाब पर पाबंदी लागू की गई थी और अदालत से उसे अनुमोदन भी मिल. देश की राजधानी में नफ़रत में भरपूर हिंदू महापंचायतका आयोजन किया गया था. उसके बाद कुछ दिनों तक मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, और नई दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों की झड़ी लग गई – हर दंगे में एक ही ढंग का खेला हुआ: रामनवमी या हनुमान जयंती के धार्मिक जुलूस हिंसक हो गए. इन जुलूसों में लोगों के हाथों में तलवारें लहरा रही होती थीं और वे उत्तेजनात्मक नारे लगा रहे थे और धीरे-धीरे ये झड़पें पूरे हिंसक दंगों में तबदील हो जाती थीं. नारेबाजी और तलवारबाजी के जवाब में जुलूसों पर पथराव करने का आरोप मुसलमानों पर लगा दिया जाता हैं
भाजपा-शासित मध्य प्रदेश में हिंसा से प्रभावित इलाकों में मुसलमानों के घर गिराने के आदेश दे दिए. जैसा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था, "हम उन घरों को गिरा देंगे जहाँ से पत्थर मलवे के ढेर पर फेंके गए थे. दिल्ली के जहाँगीरपुरी इलाके में यह खेल कुछ अलग ढंग से हुआ. यहाँ पर दुकानों और घरों को गिराने का काम “गैर-कानूनी अतिक्रमण” को हटाने की आड़ में किया गया. तथ्य तो यह है कि यह अतिक्रमण-विरोधी अभियान सांप्रदायिक हिंसा की एक भयानक वारदात हुई
भाजपा) के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने नागरिक आतंकवाद निरोधी एवं हेट स्पीच कानूनों के तहत मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर मुस्लिम कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर मुकदमा दर्ज किए हैं. उन्होंने विदेशी अनुदान विनियमन का इस्तेमाल करके या वित्तीय अनियमितताओं के बेबुनियाद आरोपों के आधार पर अधिकार समूहों को खामोश करने का प्रयास किया है. सरकार ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभावकारी कानून और नीतियां लागू की हैं. इन कृत्यों के जरिए सरकारी तंत्र और उनके हिमायतियों ने ऐसे समुदायों, खासकर मुसलमानों को बदनाम करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. पुलिस की संलिप्तता और इसके द्वारा कार्रवाई करने में विफलता ने हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को नागरिक समाज समूहों और अल्पसंख्यकों को बेखौफ होकर निशाना बनाने केलिए शह दी हुई है.
23 फरवरी, 2021 को दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा के एक 3 साल पूरे हो रहे हैं जिसमें 53 लोग मारे गए थे. मृतकों में 40 मुस्लिम थे. भाजपा नेताओं द्वारा हिंसा भड़काने और हमलों में पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता के आरोपों समेत पूरे मामले की विश्वसनीय और निष्पक्ष जांच करने के बजाय, सरकारी तंत्र ने कार्यकर्ताओं और विरोध प्रदर्शन के आयोजकों को निशानाबनाया है. सरकार ने हाल ही में एक अन्य जन प्रतिरोध, इस बार किसान आन्दोलन पर कार्रवाई की है. इसने अल्पसंख्यक सिख प्रदर्शनकारियों को बदनाम किया है और अलगाववादी समूहों के साथ उनके कथित जुड़ाव की जांच शुरू कर दी है.
इसी तरह, विभिन्न धर्मों के हजारों-हजार किसानों द्वारा नवंबर 2020 में सरकार के नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किए जाने के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं, सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों और सरकार परस्त मीडिया ने एक अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक, सिखों को बदनाम करना शुरू कर दिया. उन्होंने 1980 और 90 के दशक में पंजाब के सिख अलगाववादी विद्रोह का हवाला देते हुए सिखों पर यह आरोप लगाया कि उनका “खालिस्तानी” एजेंडा है. 8 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में विभिन्न शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में भाग लेने वाले लोगों को “परजीवी” बताया और भारत में बढ़ते सर्वसत्तावाद की अंतर्राष्ट्रीय आलोचना को “विदेशी विनाशकारी विचारधारा” कहा.